आज का समाज तेज़ी से बदल रहा है। शिक्षा, तकनीक, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सोच में आए बदलावों ने पारिवारिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया है। इन्हीं परिवर्तनों के बीच समाज में तलाक की दर का बढ़ना एक गंभीर सामाजिक समस्या बनता जा रहा है।
तलाक बढ़ने का एक प्रमुख कारण आपसी संवाद की कमी है। पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी गलतफहमियाँ समय के साथ बड़ी बन जाती हैं, क्योंकि वे खुलकर बातचीत नहीं कर पाते। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में एक-दूसरे के लिए समय निकालना कठिन हो गया है, जिससे रिश्तों में दूरी बढ़ती है।
कुछ मामले में देखा गया है कि कई सालों से साथ रह रहे जोड़े धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होते जाने लगते हैं और खुद को अजनबी समझने लगते हैं। लोग बदलते हैं और जिन गतिविधियों और रुचियों में वे कभी एक-दूसरे के साथ समय बिताते थे, उनका अब उनके जीवन में कोई स्थान नहीं रह जाता, जिससे उन्हें अकेलापन, उदासी या अलगाव महसूस होने लगता है। बच्चों के बड़े होकर घर छोड़ने की प्रक्रिया अक्सर दंपतियों के लिए अपने रिश्ते की स्थिति का आकलन करने का एक उत्प्रेरक का काम करती है।
आर्थिक कारण भी तलाक के लिए ज़िम्मेदार हैं। कई बार बेरोज़गारी, कम आय या धन को लेकर होने वाले विवाद वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा करते हैं। वहीं दूसरी ओर, महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता ने उन्हें अन्यायपूर्ण या असंतोषजनक विवाह से बाहर निकलने का साहस भी दिया है, जो कई मामलों में सकारात्मक कदम है।
व्यवहार संबंधी पैटर्न, जैसे कि मादक पदार्थों का सेवन और घरेलू हिंसा, भी तलाक की दर को प्रभावित करते हैं। मादक पदार्थों का सेवन, जिसमें नशीली दवाओं और शराब की लत शामिल है, वैवाहिक जीवन पर काफी दबाव डाल सकता है, जिससे लत से जूझ रहे दंपतियों में तलाक की दर बढ़ जाती है। इसी प्रकार, घरेलू हिंसा तलाक का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, क्योंकि यह वैवाहिक जीवन में असुरक्षित और अस्वस्थ वातावरण पैदा करती है।
शिक्षा का स्तर, आय और व्यवसाय जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक तलाक के आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्ययनों में लगातार यह पाया गया है कि कम शिक्षा स्तर और उच्च तलाक दर के बीच संबंध है। यह संबंध दर्शाता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के पास बेहतर संसाधन और सहायता प्रणाली हो सकती है, जो दोनों ही वैवाहिक स्थिरता में योगदान करते हैं।
सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव भी तलाक की दर बढ़ाने में भूमिका निभा रहा है। सोशल मीडिया के कारण तुलना, अविश्वास और अपेक्षाएँ बढ़ती हैं। इसके अलावा, विवाह को आजीवन बंधन की बजाय एक समझौते के रूप में देखने की प्रवृत्ति भी विकसित हो रही है।
तलाक का प्रभाव केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चों और पूरे समाज पर पड़ता है। बच्चों के मानसिक विकास पर इसका नकारात्मक असर हो सकता है। समाज में पारिवारिक मूल्यों का कमजोर होना भी चिंता का विषय है।
समाधान के रूप में विवाह पूर्व और विवाह पश्चात परामर्श (काउंसलिंग), पारिवारिक मूल्यों की शिक्षा, आपसी सम्मान और धैर्य को बढ़ावा देना आवश्यक है। रिश्तों को निभाने के लिए समझ, सहनशीलता और संवाद बहुत ज़रूरी हैं।
निष्कर्षतः, तलाक का बढ़ता स्तर समाज के बदलते स्वरूप का संकेत है। आवश्यक है कि हम आधुनिकता और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाकर रिश्तों को सशक्त करें, ताकि परिवार और समाज दोनों स्वस्थ रह सकें।

नूपर अग्रवाल, कोरबा
